Friday, September 2, 2011

समा बाँधा था हमने कुछ इस तरह शायरी से,
आप आ गए मदहोशी छा गयी,
जाने के बाद आप के ना लगा दिल शायरी में,
भूल गए शायरी अब तो आशिकी आ गयी !!
.................................. दिनेश ज. सुर्वे.
खामोश रह के क्या कुछ पाया है हमने?
अपने दिल पे ज़ख्म सदा पाया है हमने !
अब गीरने-संभलने की तो आदत हो चुकी है !
हम वही खड़े रहे और दुनिया बदल चुकी है !
तरसते रहे एक जवाब के इंतज़ार में ...
और सवाल क्या था वो पूंछ भी ना पाए !!
................... दिनेश ज. सुर्वे

Wednesday, February 2, 2011

यारो कुछ बाते फुरसत की होती है
इन्हें फुरसत में ही होने दो,
माना के उल्फत नहीं आपको
पर हमारे इरादे तो पक्के होने दो!
ठुकरा के उसने मुझको कहा की मुस्कुराओ,
मैने हस दिया, आखिर सवाल उसकी खुशी का था !
मैने खोया वो जो मेरा था ही नही..........
उसने खोया जो सिर्फ उसी का था.......!!!


पलकों पे आंसुओं को सजाया ना जा सका,
उसको भी हाल ए दिल का बताया ना जा सका !
ज़ख्मों से चूर चूर था ये दिल मेरा,
एक ज़ख़्म भी उस को दीखाया न जा सका !!
जब तेरी याद आई दिल को तकलीफ तो हुई मगर,
...आँखों में आंसुओं को छुपाया न जा सका !!!
हम उठ के चले आए उनकी महफ़िल से मायूस हो के,
पीछे से जालिम ने पुकारा तक नही..........!
फिर भी खुद ही रूक गए हमारे कदम,
क्यूंकि उसके बिन अब गुज़ारा भी नही ..........!!!
दर्द में कोई मौसम प्यारा नही होता,
दिल हो प्यासा तो पानी से गुजारा नही होता!
कोई देखे तो हमारी बेबसी आकर..........
हम सभी के हो जाते है, पर कोई हमारा नही होता !!!

हे डोळे तुझे शराबी ........

                      हे डोळे तुझे शराबी
                      हे ओठ तुझे गुलाबी!
                      हे गोरे गोरे अंग
                      जसा गुलाबाचा गंध!!!

                      हे हात जणू कमलपात्र
                      तुज पाहता दीपती नेत्र!
                      तुझी शुभ्र कांति बघुनी
                      घायाळ होतो मी मनोमनी !!!

                      सहवास कसा होईल प्राप्त
                      कधी होईन मी तृप्त!
                      लागला मज तुझाच ध्यास
                      ना कळे कसला हव्यास !!!

                      भाव मनातले उलगडू कसे?
                      तुज सवे मी सांगू कसे?
                      माझे प्रेम तीला कळेल का?
                      प्रीत मला मिळेल का?

Saturday, January 22, 2011

तुज संगे जगण्यासाठी आलो मी इथवरी........!

तुज संगे जगण्यासाठी आलो मी इथवरी........!
तुज संगे जगण्यासाठी आलो मी इथवरी........!
...... तूच माझ्या स्वप्नातील ग गोड परी.....!!
तुज संगे.................

आपल्या प्रेमाचा गातो मी वारसा............!
..... देतो तुला मी हा प्रेमाचा आरसा .....!!

ह्या आरश्यात आपुले प्रेम तू न्याहाळ ना .........!
...... ह्या प्रेमाची फूले पाहशील तू होताना .....!!
..... दर्प तो श्वसनी घेउन सुगन्धित होताना .....!
छबि दीसेल माझी तुलाच पाहताना .................!!!
तुज संगे...................

माझ्या प्रिये तू माझी रानी ग हृदयाची ..............!
..... गातो तुझ्यासाठी अन कविता ही तुज साठी ...!!
......तू माझी मी तुझा कल्पना ही शब्दांची.........!
सदा अंतरी तू माझ्या निर्मीती ही तुज साठी .........!!!
तुज संगे................

....................... दिनेश जगन्नाथ सुर्वे.

गुन्हा .......??

ठरवून टाकले आज पुन्हा,
न करेन मी कधीही गुन्हा !!

पण गुन्ह्याची परिभाषा काय ती?
न मिळे ज्याला योग्य न्याय ती??
न्याय न्याय करत गरीब बापडा रडतो ...
फूकाच्या अन्यायाला बळी बिचारा पडतो !!!

सरकारी योजना मुळी त्याच्या अंगी पडत नाही,
आणि सरकारचे ही त्याच्या वाचून काही अडत नाही !
दोन वेळच्या भाकरी साठी राब राब राबायचे,
आणि मरण आले की त्याच जमीनीत निपचित पडायचे !!!

जन्माला आलो हा गुन्हा म्हणुन समजायचे,
आणि जन्मठेप समजुन आयुष्य कंठायचे !
अरे हाढ !! असा गुन्हा मी करणार नाही,
या नीच भ्रष्टाचारी लोकांना मी मतदान करणार नाही !!!

मतदान माझा हक्क आहे आणि तो मी करणार,
ह्या नीच सत्ताधारी लोकांना जागा त्यांची दाखवणार !
जागे झाले राष्ट्र हे ... बोला जय महाराष्ट्र हे ...
वंदन करून मातृ-भूमी ला... चला जाऊ मतदानाला !!!

----- दिनेश जगन्नाथ सुर्वे

माझे काही स्वरचित लिखाण.........

हमको तो पीने कि आदत नही थी, और पीने कि हमको जरूरत भी नही थी !
पर जब से अपनाया नजरो ने आपको, नजरो से पीने कि आदत हो चुकी है !!
लगता है ऐसे अब जान लेगी ये आदत, आदत ये अभी बेशुमार हो रही है !
काश बचाले कोई इन कातिल नजरो से, नजरे ये अभी धारदार हो रही है...!!!
.................................. दिनेश जगन्नाथ सुर्वे.