Saturday, January 22, 2011

माझे काही स्वरचित लिखाण.........

हमको तो पीने कि आदत नही थी, और पीने कि हमको जरूरत भी नही थी !
पर जब से अपनाया नजरो ने आपको, नजरो से पीने कि आदत हो चुकी है !!
लगता है ऐसे अब जान लेगी ये आदत, आदत ये अभी बेशुमार हो रही है !
काश बचाले कोई इन कातिल नजरो से, नजरे ये अभी धारदार हो रही है...!!!
.................................. दिनेश जगन्नाथ सुर्वे.

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