Thursday, December 27, 2012

आवारगी.........!!!

आवारगी बढ़ने लगी है इस कदर
हमको नहीं अपनी कोई कुछ भी खबर
काश कोई हो जो समझे मेरी आँखों को
कोई हो साथी जो समझे इन जजबातों को
आवारगी ....... आवारगी ........ आवारगी
आवारगी बढ़ने .......

कई थे सपने इन प्यार भरी आँखों में
अब तो बाकी है कुछ टूकड़े उनकी यादों के
बह चला यूँ बह चला समंदर मेरी आँखों से
चल पडा यूँ चल पडा मै तनहा मेरी राहों पे
आवारगी ....... आवारगी ........ आवारगी
आवारगी बढ़ने .......

ठहरी नज़र उस राह पर जिस राह पर
कोई नहीं था सामने मै बेखबर
लगता ऐसे के मेरा वक़्त ठहरा हो
दिल पर यादों का मेरे सख्त पहरा हो
ना रही मंजिल कोई साथी ना कोई रहा
हम तो बस चलते रहे और फांसला बढ़ता चला
आवारगी ...... आवारगी ....... आवारगी 
आवारगी बढ़ने .......

कर दे रिहा मुझको खुदा इस खौफ से
मुश्किल बड़ा जीना लगे इस राह पे
हमको अभी इस राह पे यूँ चलते जाना है
ना तो साथी है ना कोई ठिकाना है
थम रहा ना थम रहा तूफ़ान मेरी साँसों का
चल रहा अब चल रहा जश्न-ए-बर्बादी का
आवारगी ...... आवारगी ....... आवारगी 
आवारगी बढ़ने .......
...........................  दिनेश जगन्नाथ सुर्वे

Monday, December 3, 2012

कल्लोळ.......

ऐकून आजही का
निःशब्द गार होतो
वेदना करी उसासे
निष्काम त्रास होतो

हा भाव अंतरीचा
सांगू कसा कुणास
निष्प्रेम जीव आता
रोखून श्वास घेतो

स्पर्शुनी गेले ऊन
हळूवार शांत वेळी
बरसुनी गेले मेघ
निद्रिस्त सांजवेळी

अस्फुट मंद गीत
घुटमळे उगाच
निःश्वास शांत काया
कल्लोळ तो जिव्हाळी.....!!!