Monday, July 22, 2013

सोयरा ........!!

काल येथे दुसराच होता कोणी
आज तिसराच उभा आहे 
रयतेच्या टाळू वरले लोणी
सध्या खूप स्वस्त आहे !!

नयन स्वरती आरशाला 
बोले आज मी मस्त आहे 
लावूनी नव मुखवटा 
परी आत हुंदका बंदिस्त आहे !!

शेतात रडे कोणी 
ये जोर लावूनी तू 
काळोख तो ढगांचा 
बरसण्यास भिस्त आहे !!

किती हीन तो पुढारी 
वचनांचे पाश देतो 
गुंगीत त्या क्षणांच्या 
अकस्मात ढास घेतो !!

दारात उंबराच्या सस्मित तो दिसावा 
व्याभिचाराने नटलेला पुतळा परि असावा 
रडतेय मायभू ही धाय मोकलोनी 
लुटण्यास तीस नवा हा सोयरा असावा ……….!!! 
……………...................… दिनेश जगन्नाथ सुर्वे. 

Friday, May 3, 2013

मन में है क्या ..................!

मन में हैं क्या कभी कोई माने ना
तन में हैं जज्बात कभी कोई जाने ना
तेरी लगन ऐसी लगी, तू भी कभी इसको
जानेना मानेना सोचेना समझेना
मन में है क्या ..................!

इस प्यार को क्या नाम दे
जिसका कोई भी वजूद नहीं
तेरे बिना तेरे सिवा
दिल को किसी की जरूरत नहीं
आ पास आ दिल की  सदा
पर तू भी कभी इसको
जानेना मानेना सोचेना समझेना
मन में हैं क्या ................. !!

हम जिंदगी को भूलकर
तस्वीर से तेरी चाहत करें
हैं ये दुआ रब से सदा
के वो भी हम पे इनायत करें
मेरे खुदा सुन ले ज़रा
पर तू भी कभी मुझको
जानेना मानेना सोचेना समझेना
मन में हैं क्या ................... !!!

.......................... दिनेश जगन्नाथ सुर्वे. 

तेजाब आसवांचा

लोचनांत माझ्या विरघळतात स्वप्ने
तेजाब आसवांचा विरघळतात स्वप्ने !

अंबरात मेघ, वारा गेले लांब कोसळूनी
जा तुम्ही ही दूर आठवनिंनो नयन बरसतील आता
नको सावल्यांनो थांबवा ते घुटमळणे
आभासालाही दचकून स्वप्ने बिथरतात आता !!

खंजीर भावनांचे हृदयात आत वसले
गंभीर त्या वणांचे पडसाद ना उमटले
मी द्रोह करुनी याचा फार क्षीण जाहलो
मरता मरे मरेना स्वप्नांत भंग झालो !!!
……………………… दिनेश जगन्नाथ सुर्वे. 

Thursday, December 27, 2012

आवारगी.........!!!

आवारगी बढ़ने लगी है इस कदर
हमको नहीं अपनी कोई कुछ भी खबर
काश कोई हो जो समझे मेरी आँखों को
कोई हो साथी जो समझे इन जजबातों को
आवारगी ....... आवारगी ........ आवारगी
आवारगी बढ़ने .......

कई थे सपने इन प्यार भरी आँखों में
अब तो बाकी है कुछ टूकड़े उनकी यादों के
बह चला यूँ बह चला समंदर मेरी आँखों से
चल पडा यूँ चल पडा मै तनहा मेरी राहों पे
आवारगी ....... आवारगी ........ आवारगी
आवारगी बढ़ने .......

ठहरी नज़र उस राह पर जिस राह पर
कोई नहीं था सामने मै बेखबर
लगता ऐसे के मेरा वक़्त ठहरा हो
दिल पर यादों का मेरे सख्त पहरा हो
ना रही मंजिल कोई साथी ना कोई रहा
हम तो बस चलते रहे और फांसला बढ़ता चला
आवारगी ...... आवारगी ....... आवारगी 
आवारगी बढ़ने .......

कर दे रिहा मुझको खुदा इस खौफ से
मुश्किल बड़ा जीना लगे इस राह पे
हमको अभी इस राह पे यूँ चलते जाना है
ना तो साथी है ना कोई ठिकाना है
थम रहा ना थम रहा तूफ़ान मेरी साँसों का
चल रहा अब चल रहा जश्न-ए-बर्बादी का
आवारगी ...... आवारगी ....... आवारगी 
आवारगी बढ़ने .......
...........................  दिनेश जगन्नाथ सुर्वे

Monday, December 3, 2012

कल्लोळ.......

ऐकून आजही का
निःशब्द गार होतो
वेदना करी उसासे
निष्काम त्रास होतो

हा भाव अंतरीचा
सांगू कसा कुणास
निष्प्रेम जीव आता
रोखून श्वास घेतो

स्पर्शुनी गेले ऊन
हळूवार शांत वेळी
बरसुनी गेले मेघ
निद्रिस्त सांजवेळी

अस्फुट मंद गीत
घुटमळे उगाच
निःश्वास शांत काया
कल्लोळ तो जिव्हाळी.....!!!

Saturday, November 17, 2012

लोग पुंछते हैं हम से,
क्युं अंदाज आप के बदल गये
हम वही हैं आज भी,
कल झिंदा थे आज मर गये ........!!!
कितना मजबूर ही ये दिल मेरा, तडपता तेरे प्यार में
बेवफाई तो तुने नहीं की, इसी लिये खडा हैं इंतेजार में
आज नहीं तो कल तुझे भी याद आयेगी मेरी
देर न कर जान-ए-मन शायद जान ही न जायेगी मेरी ....!!!