खामोश रह के क्या कुछ पाया है हमने?
अपने दिल पे ज़ख्म सदा पाया है हमने !
अब गीरने-संभलने की तो आदत हो चुकी है !
हम वही खड़े रहे और दुनिया बदल चुकी है !
तरसते रहे एक जवाब के इंतज़ार में ...
और सवाल क्या था वो पूंछ भी ना पाए !!
अपने दिल पे ज़ख्म सदा पाया है हमने !
अब गीरने-संभलने की तो आदत हो चुकी है !
हम वही खड़े रहे और दुनिया बदल चुकी है !
तरसते रहे एक जवाब के इंतज़ार में ...
और सवाल क्या था वो पूंछ भी ना पाए !!
................... दिनेश ज. सुर्वे
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