Thursday, September 13, 2012

मैं बहुत दूर ..... बहुत दूर चला।।

मैं बहुत दूर  ..... बहुत दूर चला।।

मैं बहुत दूर  ..... बहुत दूर चला आया
अपनी दुनिया अपना घर,
सब रिश्ते छोड़ चला आया
कुछ पल कदम ठहरे तो मगर,
मैं खुद पर काबू कर पाया।
मैं बहुत दूर  ..... बहुत दूर चला आया।।

याद तो आयी घर-परिवार की
नज़रें भी ढूंढ़ रही थी झलक मेरे यार की,
अपने दिल में यादों के सागर को समेट पाया।
मैं बहुत दूर  ..... बहुत दूर  ..... बहुत दूर चला आया।।

मंजिल तो दिख रही थी सामने, रास्ते बहुत कठिन थे
कुदरत के नज़ारे और जलवे भी कुछ और ही अजीब थे
मैं अपनी सोच और हौसले को बुलंद कर पाया
मैं बहुत दूर  ..... बहुत दूर  ..... बहुत दूर चला आया।।

दोस्त तो पूंछेंगे अगर ये तू क्या कर आया
बस कह देंगे यही जो तू न कर पाया बस वही कर आया
बस थोडीसी हिम्मत कर पाया हिमालय की गोद में अपना सिर रख आया
मैं बहुत दूर  ..... बहुत दूर  ..... बहुत दूर  ..... बहुत दूर चला आया।।

............................................................... दिनेश जगन्नाथ सुर्वे 

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